बिहार में इस समय आनंद काल चल रहा है। भाजपा वाले इसे अमृत कहते हैं। बिहार वाले इस समय अमृत पी ही नहीं रहे हैं, बल्कि अमृत में नहा रहे हैं। विकास की ऐसी गंगा बह रही है कि कैबिनेट का फैसला और घोषणा पत्र में कोई अंतर नहीं रह गया है। हाल ही में सरकार ने घोषणा की कि अगले पांच साल में पांच करोड़ लोगों को नौकरी दी जाएगी। सरकार का कार्यकाल तीन महीने का और ठेकेदारी पांच साल की। जनता समझ ही नहीं पायी कि सरकार कैबिनेट के फैसले की जानकारी दे रही है या चुनाव घोषणा पत्र जारी कर रही है।

यह भी संयोग है कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव जिस घोषणा को अपना चुनावी एजेंडा बताते हैं, उसी एजेंडा पर कैबिनेट मुहर लगा देती है। जनता अब यह भी नहीं समझ पा रही है कि सरकार तेजस्वी यादव चला रहे हैं या नीतीश कुमार। नीतीश सरकार अपने कैबिनेट की बैठक में चुनावी घोषणा पत्र जारी करती है और तेजस्वी यादव के चुनावी घोषणा पर कैबिनेट में मुहर लगाती है। इससे बड़ा बिहार के लिए अमृत काल क्या होगा कि विपक्ष का चुनावी एजेंडा सरकार का निर्णय बन जाता है। तेजस्वी यादव का तीन चुनावी एजेंडा 1500 सामाजिक सुरक्षा पेंशन, 200 यूनिट बिजली फ्री और युवा आयोग बनाने के एजेंडों को चुनाव में जाने से पहले ही सरकार ने लागू कर दिया।
यह भी संयोग है कि नौकरशाह मुख्यमंत्री की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं और मुख्यमंत्री भाजपा के राजनीतिक खेत में पुतला की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। जिसे गांव-घर की भाषा में बूत कहते हैं। अब लोग सार्वजनिक सभाओं में मुख्यमंत्री के भाषण का नहीं, बल्कि उनके अस्वाभाविक हरकतों का इंतजार करते हैं। विज्ञान की भाषा में एक शब्द है ब्रेन डेड। इसका तकनीकी अर्थ क्या होगा, यह कोई डॉक्टर ही बता पाएंगे, लेकिन राजनीतिक अर्थ यह है कि सरकार को पता ही नहीं है कि सरकार में क्या हो रहा है। उपमुख्यमंत्री एक नंबर और दो नंबर दोनों सरकार को अपनी-अपनी बैलगाड़ी में जोतना चाहते हैं, लेकिन उनकी समझ में नहीं आता है कि सरकार का पगहा कहां है। इसलिए नौकरशाह की चलती गाड़ी पर सवाकर होकर गीत गा रहे हैं- चलती का नाम सरकार।
आंनद का एक रूप यह भी है कि नीतीश फेसलेस पोलिटिशियन हैं। इनका अपना कोई गठबंधन या चेहरा नहीं हैं। गोवार टोली में गये तो महागठबंधन हो गये और भूमिहार टोली में गये तो एनडीए हो गए। उनका न कोई दोस्त है, न दुश्मन। जिसको सत्ता में साझीदार बना लिये, वह दोस्त हो गया। जिसे सत्ता से बाहर कर दिये, दुश्मन हो गया। किसी के साथ कोई स्थायी भाव नहीं। कुर्सी के खाद-पानी और जरूरत के हिसाब से टोली बदल लेते हैं। भूमिहार टोली इनकी पार्टी को खा जाने पर आमदा रहती है और गोवार टोली सत्ता निगल जाने पर आमदा रहती है। इसलिए सरकार की सेहत के हिसाब से टोली बदल लेते हैं।
विदा हो रही सत्रहवीं विधान सभा में नीतीश ने गजब के रिकार्ड बनाए हैं। इस विधान सभा के सभी सदस्य यानी सभी 243 सदस्य सत्ता के पक्ष के हिस्सा रहे हैं। इस विधान सभा ने तीन अध्यक्ष और पांच उपमुख्यमंत्री दिया है। इसी विधान सभा में मुख्यमंत्री को तीन बार शपथ लेने का मौका मिला। सत्रहवीं विधान सभा का सबसे बड़ा इतिहास है कि कम से कम तीन बार मुख्यमंत्री के अमर्यादित भाषण को कार्यवाही से हटाने की कार्रवाई की गयी। इतना ही नहीं, इसी विधान सभा में सत्तारूढ़ दल ने ही सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया।
जब हम कहते हैं कि सरकार ब्रेन डेड है तो कहने का आशय यह है कि सरकार की ही भूमिका अराजक हो गयी है। मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सरकार के मुख्य सचिव पर भारी पड़ने लगे हैं। प्रधान सचिव के सामने मुख्य सचिव का कद बौना बना दिया गया है। यह भी एक प्रकार की प्रशासनिक अराजकता है। सरकार खुद अपना अस्तित्व बचाने के लिए अराजकता का माहौल बनाये रखना चाहती है। इस अराजकता के माहौल में जनता और पार्टियां मूकदर्शक बनकर रह गयी हैं। इस अराजकता का विरोध कहीं से दिखायी नहीं देता है तो आम आदमी को राजनीतिक और प्रशासनिक अराजकता आनंद ही लेना चाहिए।










