आखिर जिसकी आशंक थी, वही हुआ। विधान सभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार के विलुप्त हो जाने की आशंका जतायी जा रही थी। लेकिन भाजपा पहले ही उन्हें डकार गयी। यह हम नहीं, भाजपा की ओर से लगायी गयी होर्डिंग कह रही है। हालांकि होर्डिंग केंद्र सरकार की नीतियों के प्रचार-प्रसार के तहत लगायी गयी है, लेकिन फोकस बिहार पर है।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हम जगदेव से होते हुए गुजर रहे थे। वहीं मोड़ पर एक होर्डिंग लगायी गयी थी। इस पर हमारा ध्यान गया। चुनाव के मौसम में प्रचार स्वाभाविक है। बिहार में भाजपा के मालिकाना हक वाला एनडीए की सरकार है। इस सरकार के ठेकेदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। लेकिन बिहार सरकार की उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार से मुख्यमंत्री गायब हैं। अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास का झुनझुना बजा रहे हैं। संदर्भित होर्डिंग में नारी सशक्तीकरण और स्वास्थ्य से जुड़ी उपलब्धियों पर फोकस किया गया है। इस पर लोगो भारत सरकार का लगा हुआ है। मतलब यह है कि बिहार सरकार की उपलब्धियां अब प्रधानमंत्री के पोस्टरों का केंद्रीय विषय हो गयी हैं और मुख्यमंत्री हाशिये पर धकेल दिये गये हैं।

अभी हाल में सीतामढ़ी में जानकी मंदिर के जीर्णोद्धार और पुनर्निमाण को लेकर करोड़ों की योजनाओं की शुरुआत हुई। इसमें एक-एक पैसा बिहार सरकार का लगा हुआ है। लेकिन उद्घाटन करने पहुंच गये केंद्रीय मंत्री अमित शाह। नीतीश कुमार टुकुर-टुकुर ताकते रह गये। सीतामढ़ी में सीएम के भाषण ने साबित कर दिया कि उनकी अब पूरी उपलब्धि मोदी वंदना में सिमट गयी है। उनका स्वाभिमान भी भाजपा का गुलाम बन गया है।
2022 के जुलाई-अगस्त महीने में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने नीतीश कुमार के जदयू को निगल जाने का ऐलान कर दिया था और इसकी कार्ययोजना भी तैयार कर ली थी। इसके बाद नीतीश कुमार ने राजद के मालिकाना हक वाले महागठबंधन के साथ आकर अपनी सरकार और पार्टी को बचाया था। लेकिन 17 महीने में ही वापस भाजपा के साथ चले गये। 2022 में जदयू को निगल जाने का भाजपा का लक्ष्य 2025 में पूरा हो गया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में हर निर्णय के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अनुकंपा पर आश्रित हो गये हैं। भाजपा अनुकंपा की डोर कभी काट सकती है और नीतीश कुमार को पैदल कर सकती है। जदयू के सवर्ण सांसद और नेता कागज पर जदयू के साथ हैं। वे भाजपा के निर्देश पर कभी भी जदयू सरकार और जदयू संसदीय दल की अर्थी उठाने के लिए तैयार बैठै हैं।
जदयू आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिसके कंधे पर जदयू बैठा है, वही डूबाने की जिद पर अड़ा है। नीतीश कुमार सवर्ण नेता और अधिकारियों पर आश्रित हो गये हैं। ये नेता और अधिकारी भाजपा के इशारे पर पार्टी और सरकार चला रहे हैं। इसलिए बिहार सरकार की उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार से नीतीश कुमार विलुप्त हो रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।











