लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बिहार की राजनीतिक फिजां बदल दी है। चुनाव आयोग पर आरोपों से उपजी परिस्थति के बाद महागठबंधन बिहार में नया तेवर दिखा रखा है। वोटर अधिकार यात्रा में भीड़ उमड़ रही है। यह भीड़ किसी एक पार्टी या नेता के पीछे नहीं दौड़ रही है। यह भीड़ उम्मीदों, सरोकारों और बदलाव की आकांक्षा के साथ दौड़ रही है। नि:संदेश इसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं।

वोटर अधिकार यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। इसे कांग्रेस के आधार बढ़ने के रूप में नहीं लिया जा सकता है। लेकिन राहुल गांधी का राजनीतिक कद बढ़ने का असर आधार वोट पर भी पड़ेगा। भारत जोड़ो यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यात्रा के कारण राहुल गांधी के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है।
बिहार में महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव हैं। यह लगभग तय है। राजद का प्रचार अभियान इसी बात को पुष्ट करता है। कांग्रेस को भी इससे कोई एतराज नहीं है। अन्य पार्टियां भी तेजस्वी के नेतृत्व पर सहमत हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी की लोकप्रियता की आंच को तेजस्वी यादव झेल पाएंगे। यह निर्विवाद है कि बिहार में तेजस्वी यादव महागठबंधन के सर्वमान्य नेता हैं, लेकिन राहुल गांधी की इंट्री के बाद तेजस्वी का कद घटने लगा है। वोटर अधिकार यात्रा में तेजस्वी यादव दूसरे नंबर के नेता हो गये हैं। तेजस्वी यादव को अब भाजपा के वैचारिक विरोध की राजनीति के साथ ही महागठबंधन में कांग्रेस के कद और प्रभाव से भी लड़ना होगा। राहुल गांधी बिहार में जितना सक्रिय होंगे, तेजस्वी यादव का कद उतना ही छोटा होता जाएगा। मीडिया का कवरेज भी राहुल गांधी की ओर शिफ्ट होता जाएगा।
कांग्रेस के राजनीतिक हलकों में चर्चा के अनुसार, चुनाव तक राहुल गांधी पूरी तरह बिहार में एक्टिव रहेंगे और जनता के बीच कैंप करते रहेंगे। इस या उस कार्यक्रम के बहाने में उनकी सक्रियता की वजह है कि उन्हें अब अपना राजनीतिक आधार बढ़ाना है। भाजपा और कांग्रेस की त्रासदी है कि दोनों पार्टियों के पास कोई क्षेत्रीय नेता नहीं है। दोनों पार्टियों को केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे चुनाव लड़ना पड़ता है। राहुल गांधी भी इस वास्तविकता से परिचित हैं। इसलिए बिहार में ज्यादा सक्रिय दिखना चाहते हैं।
राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव से मुकाबले के लिए तेजस्वी यादव को खुद में बदलाव करना होगा। उन्हें वोटर अधिकार के साथ समर्थकों और कार्यकर्ताओं के सम्मान के लिए अभियान चलाना होगा। तेजस्वी यादव ने अब तक जितनी भी यात्रा की है, वह सामंती ठाट-बाट वाली रही है। सर्वसुविधा संपन्न वाहन, सर्किट हाउस का ठहराव और भेड़-बकरी तरह कार्यकर्ता से व्यवहार उनकी विशेष शैली रही है। इसमें तेजस्वी यादव को बदलाव लाना होगा। महंगी गाडि़यों का काफिला और बगुला भगतों की भीड़ से निकलकर आम वोटरों के बीच खड़ा होना होगा। उनके साथ उठना, बैठना और खड़ा होना होगा। उन्हें गले लगाना होगा। तेजस्वी यादव को दस नंबर के दरवाजे खोलने होंगे और सामंती कल्चर से मुक्त होना होगा। साथ ही कुर्ता पर आयरन और देह की ऐंठन दोनों को ढीला करना होगा। तभी समर्थकों का साथ बना रहेगा। गांव में एक कहावत है, जिसके आंगन में गेहूं सूखता है, उसे ही उधार भी मिलता है। वैसे तेजस्वी यादव आमतौर पर टीशू पेपर से हाथ मलते रहते हैं। लेकिन समय रहते अपनी शैली, कार्य व्यवहार और रणनीति में बदलाव नहीं लाए तो चुनाव के बाद हाथ ही मलते रहेंगे।










