चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढांचे की सड़ांध को उजागर कर दिया है। एसआइआर के कारण मतदाता स्तर पर एक नयी जागृति आयी है। वोटर अपने अस्तित्व को लेकर सजग हो गया है। प्रवासी वोटर चुनाव की तिथि देखकर छठ, दिवाली या होली में घर नहीं लौटता है। वह त्योहार की तिथि और ट्रेनों में सीट की उपलब्धता पर आने-जाने की तारीख तय करता है। इस दौरान यदि मतदान की तिथि पर पड़ गयी तो वोट भी डाल आता है। एकमात्र मुखिया का चुनाव ही है, जिसमें उम्मीदवार चुनाव की तिथि के हिसाब से अपने प्रवासी करीबी परिजनों को किराया देकर बुलाता है।

बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण मतलब एसआइआर की प्रक्रिया चल रही है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की होती है। इनकी मदद के लिए चुनाव आयोग ने बूथ लेवल एजेंट को भी अधिकृत कर दिया है। बूथ लेवल एजेंट राजनीतिक पार्टियों की ओर से अधिकृत व्यक्ति होते हैं, जो बूथ स्तर पर राजनीतिक कार्यों के लिए पार्टी के प्रतिनिधि होते हैं।
बिहार में 12 मान्यता प्राप्त पार्टी हैं। इसमें छह राष्ट्रीय और छह क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, विधान सभा चुनाव के लिए 90712 बूथ बनाये गये हैं। इसके आधार पर बूथ लेवल आफिसर यानी बीएलओ की संख्या 90712 है। सभी दलों के पास 90712 बीएलए नामित करने का अवसर था, लेकिन इस मामले में पार्टियां फिसड्डी साबित हुई हैं। खुद को मजबूत संगठन वाली पार्टी कहने वाली भाजपा के बीएलए की संख्या 53318 है। मतलब है कि 59 फीसदी बूथों पर ही भाजपा के बीएलए हैं, जबकि 41 फीसदी बूथों पर उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है। सत्ता के प्रबल दावेदार राजद के बीएलए की संख्या 47506 है। मतबल है कि 48 फीसदी बूथों पर बीएलए नहीं हैं। जबकि सत्तारूढ़ दल जदयू की स्थिति और खराब है। उसके बीएलए की संख्या 36550 है। मतलब 60 फीसदी बूथों पर जदयू का कोई बीएलए नहीं हैं। अन्य पार्टियों की स्थिति इस मामले में और बदहाल है।
हम बीएलए यानी बूथ लेवल एजेंट की संख्या पर फोकस करने के बजाये इनकी उपयोगिता पर बातचीत करना चाहते हैं। विभिन्न पार्टियों के 1 लाख 60 हजार से अधिक बीएलए हैं। इन लोगों ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मात्र 10 आवेदन आयोग के समक्ष दिये हैं। यह दावा, आपत्ति या शिकायत से जुड़े हैं। ये सभी आवेदन माले ने ही दिये हैं। चुनाव आयोग हर बार इस बात पर जोर देता है कि प्रदेश में 1 लाख 60 हजार से अधिक बीएलए हैं, लेकिन एसआइआर की प्रक्रिया पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया है। मतलब यह भी है कि बूथ स्तर पर कार्यों को लेकर सभी दल संतुष्ट हैं। दरअसल एसआइआर की उपयोगिता और समय को लेकर ही विवाद शुरू हुआ था और मामला सर्वोच्च न्यायााालयय तक पहुंचा। दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठ रहे थे। कई सुनवाई के बाद अनेक समस्याओं का समाधान हो गया है। अब आधार को भी दस्तावेज के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इसके साथ ही अब प्रारूप मतदाता सूची में नहीं जोड़े गये नामों को कारण सहित प्रकाशित कर दिया गया है।
कांग्रेस और राजद समेत महागठबंधन के अन्य दल वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं। यात्रा का नाम जोड़ने, घटाने या हटाने से कोई वास्ता नहीं है। यह शुद्ध रूप से राजनीतिक अभियान है और इसे चुनाव प्रचार अभियान का हिस्सा के रूप में लेना चाहिए।
चुनाव आयोग द्वारा बूथवार हटाए गये नामों को सार्वजनिक करने के बाद इसमें संशोधन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। इसमें राजनीतिक दलों की कोई भूमिका नहीं है। जैसाकि आयोग कह रहा है कि बीएलए निरर्थक साबित हो रहे हैं। दरअसल बूथ स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण काम लोकल बॉडी के निर्वाचित प्रतिनिधि और आगामी पंचायती राज और नगर निकाय के संभावित उम्मीदवार कर रहे हैं। उनका चुनाव भी इसी फाइनल वोटर लिस्ट के आधार पर होना है। हालांकि उनके चुनाव तक इसकी संख्या में थोड़ी वृद्धि हो सकती है, लेकिन आधार विधान सभा का वोटर ही माना जाएगा। राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची के लिए अलग से कोई पुनरीक्षण नहीं करता है। वार्ड के आधार पर विधान सभा की वोटरलिस्ट का विखंडन कर बूथ और वोटर लिस्ट बनाता है। यही वजह है कि लोकल बॉडी में रुचि रखने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय हैं। लोकल बॉडी का चुनाव दलविहीन होता है। इसलिए बूथ लेवल पर वे किसी पार्टी के प्रतिनिधि बनने के बजाये स्वतंत्र रूप से मतदाता सूची में नाम जोड़वाने या हटवाने के लिए सक्रिय हैं। ऐसे लोग हर पार्टी और धारा के साथ जुड़े हुए हैं। इसलिए किसी भी गड़बड़ी या सुधार की क्रॉसचेकिंग आसान हो गयी है।
एसआइआर की प्रक्रिया पर बहस जारी रहेगी। मामला कोर्ट में भी चलता रहेगा। लेकिन स्थानीय और बूथ स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता से बूथ लिस्ट में गड़बड़ी की गुंजाईश काफी कम हो गयी है। सच तो यह है कि वोटरलिस्ट को लेकर विधायकों की भी कोई रुचि नहीं है। वे मानते हैं कि जितना वोटर कम होगा, उतना चुनाव में खर्चा कम होगा। जबकि लोकल बॉडी के दावेदारों के लिए एक-एक वोट महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका एक-एक वोटर के साथ व्यक्तिगत संपर्क होता है और वोटर की प्रतिबद्धता से वाकिफ होते हैं। इसलिए चाहते हैं कि अपने समर्थक वोटर का नाम ज्यादा से ज्यादा जोड़वाया जा सके। साथ ही प्रारूप सूची में हटाए गये पात्र नामों को भी जोड़ा जा सके।
एसआइआर के पूरे डेढ़-दो महीने की प्रकिया ने साबित कर दिया है कि बीएलए पार्टियों की बारात का मेला भर हैं। एकदम गोबर-गणेश। चुनाव आयोग के निर्देश के कारण बीएलए नामित करना पार्टियों के लिए आवश्यक माना गया है, लेकिन यह बाध्यता नहीं है। इसलिए ये हाशिये पर ही रहते हैं। एसआइआर की घोषणा के बाद बीएलए की संख्या में काफी इजाफा हुआ था, वह भी सिर्फ गिनती के लिए। उनका काम तो चुनाव आयोग ही बता रहा है।
कुल मिलाकर चुनाव आयोग ने पार्टियों की संगठनात्मक ढांचे की सड़ांध को उजाकर दिया है। एसआइआर की पूरी प्रक्रिया ने यह बता दिया है कि पार्टियां अपने आधार को बांधे रखने और उसे बढ़ाने पर जोर देती हैं। वोटर के सम्मान, सरोकार और अस्तित्व का सवाल उनके लिए राजनीतिक हथकंडा है, राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं।











