प्रदेश में भाजपा के आधिपत्य वाली एनडीए सरकार निर्बाध रूप से चल रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। सबकुछ शांतितिपूर्ण चल रहा है। सरकार के घटक दलों में कोई मतभेद नहीं। सभी पीएम नरेंद्र मोदी के प्रति वफादारी की कसम खा रहे हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व से कोई नाराजगी भी नहीं है। हर दल बम- बम है। सत्ता की मलाई बिना आंकड़ पत्थर के चाभ रहे हैं। लेकिन भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बेचैन है। अरबों रूपये फूंकने के बाद भी बैलगाड़ी में जुते बैल की पूंछ ऐंठने की औकात ही है। बैलगाड़ी का नाधा और चाबुक नीतीश कुमार के पास है। भाजपा की मजबूरी है कि वह फिलहाल चाबुक नहीं छीनना चाहती है। डर है कि गाड़ी में जुते बैल भड़क जाएंगे। तब पूंछ ऐंठने की हैसियत भी नहीं रह जाएगी।
इसलिए भाजपा ने अपनी रणनीति बदल दी है। उसने मंथन किया है कि नीतीश के आधार वोट को नाराज किये बगैर नीतीश के हाथ से शांतिपूर्ण सत्ता कैसे सरकायी जाए। इसके लिए दो स्तर पर काम हो रहा है। पहला है अतिपिछड़ा वोटों में नाराजगी नहीं भड़के और ऐसे व्यक्ति को नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी चुना जाए, जो अतिपिछड़ों को सहजता से स्वीकार से हो। जदयू के एक वरिष्ठ अतिपिछड़ा विधायक की चिंता थी कि नीतीश के बाद पार्टी को कौन संभालेगा। इसी लिए नीतीश के बेटे निशांत को राजनीति में लाने का प्रयत्न किया जा रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री इसके लिए तैयार नहीं होंगे।
नीतीश के बाद या नीतीश का विकल्प को लेकर एनडीए के सभी दलों में मंथन जारी है, लेकिन सतह पर कोई आने को तैयार नहीं है। चिराग पासवान, जीतनराम मांझी या उपेंद्र कुशवाहा जैसे लोग सत्ता के लटकन हैं। सत्ता के साथ लटके रहना उनकी मजबूरी है। इनकी पूरी राजनीति सौदागिरी की है। लेकिन भाजपा सौदे के लिए नहीं, सत्ता के लिए बेचैन है। इसके लिए उसने नीतीश के तहखाने में सुराक लगाने की रणनीति बना ली है।
राजनीतिक गलियारे की चर्चा के अनुसार, भाजपा पहले जदयू के अंदर से ही जदयू सरकार में नीतीश का ऐसा उत्तराधिकारी पैदा करना चाहती है, जिसके नाम पर अतिपिछड़ा में भी विद्रोह की नौबत नहीं आये। इसी कड़ी में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पुत्र और केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर को नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में प्रोजेक्ट करने की योजना बना ली है। रामनाथ ठाकुर के नाम पर अतिपिछड़ी जातियों में बगावत की नौबत भी नहीं आएगी और वे सहजता से स्वीकार्य भी हो जाएंगे। इसके साथ नीतीश कुमार सत्ता केंद्र से किनारे कर दिये जाएंगे और अतिपिछड़ी जाति को भी अपना नया नेता मिल जाएगा। इस रणनीति के तहत भाजपा को अतिपिछड़ा आक्रोश का सामना भी नहीं करना पड़ेगा।
भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो भाजपा सीधे नीतीश से सत्ता नहीं हथियाना चाहती है। इसके लिए नयी राह बनाना चाहती है। वह रामनाथ ठाकुर को आगे कर सत्ता पर अप्रत्यक्ष कब्जा करना चाहती है। जब नीतीश राजनीति के केंद्र से बाहर होंगे तो नीतीश के नाम की राजनीति और वोटों दोनों पर एक साथ कब्जा जमाना आसान हो जाएगा। भाजपा अब एक बेहतर अवसर और समय का इंतजार कर रही है। लेकिन बजट सत्र के पहले इस कार्ययोजना को जमीन पर उतारने का उतावलपन भाजपा में नहीं है।










