केंद्रीय चुनाव आयोग। इसके मुखिया हैं ज्ञानेश गुप्ता, जाति से बनिया। मुखिया मतलब मुख्य चुनाव आयुक्त। बिहार में बनिया भाजपा का वोटर माना जाता है। ज्ञानेश गुप्ता बिहार में वोटर नहीं बन सकते हैं। इसलिए भाजपा के सपोर्टर के रूप में नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा की राह में कांटा और कांटी बुन रहे हैं।

चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में बिहार की राजनीतिक जमीन पर आग लगा दी है। रोज उसमें फर्जी आंकड़ों की आंच लगा रहा है और बिहार धधक रहा है। नई दिल्ली की सदन और सड़कों पर भी आंच पहुंच रही है और पूरा देश चुनाव आयोग की मंशा को लेकर आशंकित है।
सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान 14 अगस्त को चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि आधार कार्ड को भी एक दस्तावेज के रूप में शामिल किया जाये। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि आयोग को प्रारूप मतदाता सूची से हटाए गए सभी नामों को सार्वजनिक करना होगा और यह भी बताना होगा कि कोई नाम क्यों काटा गया है। कोर्ट ने कहा कि इन नामों को आयोग की बेवसाइट पर अपलोड करने के साथ ही सभी सार्वजनिक जगहों यथा बूथ, पंचायत भवन, सामुदायिक भवन आदि जगहों पर भी चिपकाया जाना चाहिए। इसके प्रति जागरूकता के प्रशासन को प्रचार अभियान भी चलाया जाना चाहिए।
एसआईआर की शुरुआत बिहार से हुई है। आयोग के अनुसार, देश भर में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। लेकिन बिहार में जो रहा है, वह देश में होने वाले वोट लूट का पूर्वाभ्यास ही है। चुनाव आयोग ने एक झटके में बिहार के 65 लाख से अधिक मतदाताओं को डकार गया। डकारे गये मतदाताओं को तीन श्रेणी में बांटा गया है। इसमें पहला है मृतक, दूसरा है स्थायी रूप से स्थानांतरित और तीसरा है दो जगह पर नामांकित। इन तीन श्रेणी के डकारे गये लोगों की पहचान किसने की। उसका नाम है बीएलओ। बीएलओ की रिपोर्ट पर किसी को मरा हुआ मान लिया गया, किसी को अनुपस्थित या स्थानांतरित बता दिया तो किसी को दो जगहों पर नाम होना बता दिया गया।
सबसे पहला सवाल यह है कि किसी व्यक्ति का नाम दो जगहों पर वोटर लिस्ट में अंकित है। यह कैसे तय किया गया। क्यों दोनों जगहों की बूथ लिस्ट में मिलान किया गया। फिर यह कैसे तय हुआ कि किस बूथ पर नाम काटा जाएगा। यह पूरी तरह फर्जी और झूठी प्रक्रिया है। यह बीएलओ की मनमानी का नतीजा है। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का नाम प्रारूप मतदाता सूची में बांकीपुर और लखीसराय दो जगहों पर है। चुनाव आयोग ने भी स्वीकार किया है और उन्हें नोटिस भी जारी किया था। सवाल यह है कि जब दो जगहों पर नाम होने के आधार पर नाम काट गया है तो विजय कुमार सिन्हा का नाम दो जगह कैसे रह गया है। आयोग कहता है कि मतदाता द्वारा आवेदन करने के बाद ही प्रारूप मतदाता सूची में नाम शामिल किया गया है तो क्या विजय कुमार सिन्हा ने दो जगहों पर अपना फार्म जमा किया था। मतलब यह कि डबलीकरण के आधार पर मतदाताओं का नाम हटाने का कोई भौतिक और वास्तविक पद्धति नहीं है। यह बीएलओ की मनमानी से हुआ है।
आयोग के अनुसार 22 लाख से अधिक मतदाता की मृत्यु हो गयी है। इसी आधार पर उनका नाम काटा गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी पुराने लिस्ट में शामिल वोटर का मृत्यु प्रमाण पत्र परिजनों ने दिया है। ऐसे कितने मृत्यु प्रमाण पत्र आयोग को मिला है। अब मीडिया रिपोर्ट में सामने आ रहा है कि मरे हुए लोगों का नाम प्रारूप मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया है और जीवित व्यक्तियों को मरा हुआ बताकर नाम काट दिया गया है। अपनी इस लापरवाही और विफलता की जिम्मेवारी लेने के बजाये आयोग गलथेथरी कर रहा है तथा दावा और आपत्ति की बात कर रहा है।
सबसे अधिक 36 लाख 28 हजार व्यक्ति को स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित बताकर प्रारूप मतदाता सूची से हटा दिया गया है। स्थायी रूप से स्थानांतरित की क्या परिभाषा हो सकती है। बिहार में ऐसे लाखों लोग हैं, जो रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे शहर या राज्यों में जाते हैं। होली, दीपावली और छठ में आते हैं। शादी विवाह के मौके पर भी लौटते हैं। ऐसे लोग बड़ी संख्या में मतदान करने भी आते हैं। ऐसे ही लोगों को शिफ्टेड या अनुपस्थित बताकर आयोग ने नाम काट दिया है। हर बूथ पर औसतन 100 वोट काटे गये हैं।
लोकसभा में नेता प्रपिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग एक पार्टी विशेष के पक्ष में फर्जी नाम जुड़वाने का धंधा भी करता है। यह धंधा बिहार में भी हो सकता है। इसकी पूरी आशंका है। राजनीतिक दलों को इसको लेकर भी सतर्क रहने की जरूरत है।
वीरेंद्र यादव न्यूज के रिसर्च एवं राजनीतिक गलियारे में चर्चा के अनुसार, सबसे अधिक वोट अतिपिछड़ी और दलितों के काटे गये हैं। जिन लोगों को शिफ्टेड और अनुपस्थित बताया गया है कि उनमें से 70 फीसदी लोग अतिपिछड़ी और दलितों जातियों के हैं। इनमें से अधिकतर लोग काम की तलाश में जगह बदलते रहते हैं, लेकिन स्थायी निवास उनका अपना पैतृक गांव ही होता है। वोटर भी वे लोग वहीं के होते हैं। किसी भी शहर या प्रदेश में काम करने वाला बिहारी को जब आवासीय प्रमाण पत्र की जरूरत होती है तो अपने पैतृक गांव का ही बनवाता है। पासपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में भी आवासीय प्रमाण पत्र के रूप में गांव का ही सर्टिफिकेट दर्ज करते हैं, भले ही वे देश के किसी कोने में कार्य करते हों। लेकिन रोजी-रोटी की तलाश में जगह बदलने वालों का वोट का अधिकार चुनाव आयोग डकार गया।
एसआईआर का सबसे अधिक नुकसान नीतीश कुमार के जदयू को होने वाला है। चुनाव आयोग ने सीधे-सीधे जदयू के आधार वोट पर डाका डाला है। गैरबनिया अतिपिछड़ा और दलितों का एक बड़ा हिस्सा जदयू का आधार वोटर रहा है। भाजपा ने हिंदूत्व के नाम पर इन वोटों को अपने पाले में करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली तो चुनाव आयोग का इस्तेमाल किया। भाजपा ने चुनाव आयोग के माध्यम से इन वर्गों को वोट का अधिकार ही लूट लिया। अगले विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार आधारविहीन नेता हो जाएंगे। उनका कोर समर्थक मतदान केंद्र पर पहुंच ही नहीं पाएगा। भाजपा ने यह काम जदयू के सवर्ण नेताओं को विश्वास में लेकर किया। इसी में उनका राजनीतिक लाभ भी है। इसलिए ये लोग एसआईआर की प्रशंसा कर रहे हैं। हम, लोजपा या रालोमो जैसी परजीवी पार्टियां का अपना कोई आधार नहीं है। इसलिए भाजपा के सुर में सुर मिला रहे हैं।
चुनाव आयोग ने एसआईआर के नाम पर बिहार के 13 करोड़ से अधिक लोगों को आग में झोंक दिया है। 50 लाख से अधिक मताधिकार से वंचित किये गये लोग अपना नाम जुड़वाने के लिए बूथ-बूथ भटक रहे हैं। पांच दिनों का विधान सभा का मानसून सत्र एसआईआर की भेंट चढ़ चुका है। पूरा प्रशासनिक तंत्र इस नाम पर पंगू हो गया है। बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी कार्यालयी कार्यों को छोड़कर वोटरों का नाम काटने और जोड़ने में जुटा हुआ है। विकास कार्य ठप हो गये हैं।
केंद्रीय चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया पूरा करने के बजाये राजनीतिक अराजकता पैदा करने में जुटा है। वह राजनीतिक दल की तरह भूमिका का निर्वाह कर रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। चुनाव आयोग बने बनाये मतदाता सूची को पहले कूड़ादान में डाल दिया है और फिर नया मतदाता सूची बना रहा है। एसआईआर की प्रक्रिया पुनरीक्षण नहीं है, बल्कि यह मतदाता सूची का पुनर्लेखन है, जिसका उद्देश्य पात्र लोगों का मताधिकार छीनना है। बीएलओ और प्रशासनिक तंत्र की गलती के कारण जिन लोगों नाम प्रारूप मतदाता सूची में नहीं लिखा गया है, उन्हें फर्स्ट टर्म वोटर के रूप में अपना नाम दर्ज करवाना होगा। पांच-सात चुनाव में मतदान कर चुके लोग भी फर्स्ट टर्मर होंगे। यह चुनाव आयोग का वैचारिक दिवालियापन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आयोग के वैचारिक दिवालियापन का पहला शिकार बिहार को होना पड़ा है।











