जब भी चुनाव आता है मन का कीड़ा कुलबुलाने लगता है। लगता है कि इस बार चुनाव लड़कर सांसद-विधायक बन जाएंगे। कई बार मन मार कर बैठ जाते हैं तो कई बार उछल-कूद कर लौट आते हैं। संसदीय चुनाव कभी नहीं लड़ा। एक बार मुखिया का उपचुनाव लड़ा था। 20 वोट आये थे और हार-जीत का मार्जिन मात्र 15 वोट का था। तब समझ में आया कि चुनाव में 20 वोटवा उम्मीदवार भी परिणाम प्रभावित करने में सक्षम होता है।

अक्टूबर-नवंबर में 18वीं विधान सभा चुनाव होने वाला है। इस बार फिर मन अलबलाने लगा है। लेकिन अबकी बार हम नोखा विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते हैं। पार्टी अभी तय नहीं है। वजह साफ है कि हम किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं हैं, कोई राजनीतिक धारा नहीं है। जहां भी बहता पानी दिख गया, लाठी पीट दिया। न लाठी को नुकसान, न पानी को।
इस बार चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम तेजस्वी यादव का होगा। एक तरफ तेजस्वी होंगे और दूसरी ओर नरेंद्र मोदी। इस चुनाव अभियान में नीतीश कुमार भाजपा के डम्मी कंडिडेट होंगे। चुनाव में डम्मी कंडिडेट खड़े किये जाते हैं। मान लीजिए, धनंजय नाम का कोई उम्मीदवार है। सरकारी दस्तावेजों में चुनाव खर्च और प्रचार अभियान की सीमा तय होती है। एक उम्मीदवार के नाम पर बहुत ज्यादा गड़बड़ नहीं किया जा सकता है। इसलिए धनंजय के किसी सपोर्टर धीरेंद्र को निर्दलीय मैदान में उतार दिया जाता है। धनंजय के संसाधन और माल-पानी का इस्तेमाल धीरेंद्र अपने नाम पर करेंगे और प्रचार धनंजय का करेंगे। यही है चुनाव में डम्मीवाद। इस विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री के असली उम्मीदवार नरेंद्र मोदी होंगे। नीतीश कुमार सीएम के डम्मी उम्मीदवार होंगे, जो भाजपा के संसाधनों और माल-पानी पर नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार अभियान चलाएंगे। चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी की ओर से जिस व्यक्ति के नाम की घोषणा मुख्यमंत्री के रूप में करेंगे, नीतीश उसके समर्थन में खड़े रहेंगे। अब तक बिहार ने विधायक चुनाव में डम्मी उम्मीदवार का आनंद उठाया है। इस बार डम्मी मुख्यमंत्री उम्मीदवार का आनंद उठाएगा।
एक बार हम फिर चुनाव लड़ना चाहते हैं। विधान सभा क्षेत्र नोखा होगा। नोखा रोहतास जिले के तहत आता है। नोखा हमारा मूल विधान सभा क्षेत्र ओबरा से लगा हुआ है। दोनों विधान सभा क्षेत्रों की सीमा सोननदी है। सोननदी पर दाउदनगर-नासरीगंज पुल बन जाने के बाद दोनों विधानसभा क्षेत्रों की दूरी मिट गयी है। यह भी कह सकते हैं कि नोखा विधान सभा क्षेत्र चार अनुमंडल -दाउदनगर, बिक्रमगंज, सासाराम और डिहरी – की सीमा से आंशिक या पूर्णरूप से जुड़ा हुआ है। इस विधान सभा क्षेत्र से हमारा इसलिए जुड़ाव है कि नोखा विधान सभा क्षेत्र के तहत आने वाले नासरीगंज प्रखंड के कैथी गांव में दादाजी का पुश्तैनी घर था। बाद में वे परिवार के साथ ओबरा विधान सभा क्षेत्र में डिहरा गांव में बस गये थे।
नोखा विधान सभा क्षेत्र में नासरीगंज, राजपुर और नोखा प्रखंड की सभी पंचायत और नगर निकाय आते हैं। पूरे इलाके में सड़कों का जाल बिछा हुआ है। लगभग हर गांव पक्की सड़क से जुड़ा है। हर गांव में बिजली भी है। नहरी क्षेत्र होने के कारण सिंचाई का कोई संकट नहीं है।
अब मुद्दे पर लौटते हैं। हम यह भी जानते हैं कि चुनाव आते-आते लभकल मन शांत हो जाएगा। न कोई पार्टी टिकट देगी और न हम निर्दलीय लड़ेंगे। लेकिन मन मारने के लिए मन का मरना जरूरी है। यह तभी संभव है, जब हम उस प्रक्रिया के साथ जुड़ने का प्रयास करें और फिर नकार दिये जाएं। दरअसल नकार दिया जाना या स्वीकार किया जाना समय, संयोग और परिस्थितियों पर निर्भर है। हमने राजनीति में हाथी को केचुआ और केचुआ को हाथी बनते देखा है। दोनों के बीच की सीमा रेखा अदृश्य है। उस सीमा रेखा का अहसास तभी होता है, जब हम उसको लांघकर कर गुजरने का प्रयास करते हैं। और हम हर परिस्थिति में प्रयास, हर बार प्रयास में भरोसा करते हैं।











