केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय। उजियारपुर से सांसद हैं। राय सरनेम को लेकर कंफ्यूज मत होइए। यादव जी हैं। कभी वे मुख्यमंत्री उम्मीदवार होने का हवा बांध रहे थे। अब पस्त हो गये हैं। गृह मंत्रालय की जिम्मेवारियों से उन्हें फुर्सत नहीं है।

बिहार भाजपा की राजनीति में यादवों का नेता कौन है। आज-कल यही चर्चा का विषय है। बिहार में भाजपा के 8 विधायक, 2 विधान पार्षद और 2 सांसद हैं। विधान परिषद और राज्य सभा में भाजपा कोटा यादवों के लिए प्रतिबंधित है। भाजपा और यादवों के बीच का अंतर्विरोध भी काफी है। भाजपा यादव जाति को अपना आधार वोट नहीं मानती है। यादव लोग भाजपा विधायकों को अपना नहीं मानते हैं। जाति के नाम पर वोट भले दे दिया हो, लेकिन कोई अपेक्षा नहीं रखते हैं। भाजपा कोटे के मंत्री के यहां भी कोई यादव काम की अपेक्षा लेकर नहीं जाता है। हालांकि अभी भाजपा कोटे से कोई मंत्री भी नहीं हैं।
भाजपा में अभी दो एमएलसी हैं। दोनों अपनी ताकत के बल पर निर्वाचित होते हैं। उनकी जीत में पार्टी की भूमिका सेकेंड्री और उनका अपना प्रभाव प्राइमरी हो जाता है। यही हाल विधायकों का भी है। भाजपा के आठ यादव विधायकों की जीत में उनका अपना प्रभाव भी एक बड़ा फैक्टर साबित होता है। विधान सभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार होना भी मायने रखता है। लेकिन पार्टी निर्णय में इन विधायकों का दखल न्यूनतम होता है। एकाध अपवाद हो सकते हैं।
हम बात कर रहे थे नित्यांनद राय की। क्या वे अपने प्रभाव से भाजपा को वोट दिलवाने में सक्षम हैं। भाजपा का सवर्ण लॉबी मानती है कि जरूरत से ज्यादा पार्टी में नित्यांनद राय को तरजीह दी जाती है। भाजपा के यादव गलियारे में भी यह सवाल पूछा जाने लगा है कि नित्यानंद राय का सामाजिक योगदान क्या है। कितने यादवों को सत्ता का लाभ दिलवा पाये हैं। निगम, बोर्ड और आयोगों में लगभग 200 लोगों को सत्ता की मलाई बांटी गयी, उनमें से कितने यादवों को हिस्सेदारी मिली। भाजपा नेताओं में यादवों के प्रति जो एक नफरत की मानसिकता रही है, उसे दूर करने में नित्यानंद कितना सफल हो पाए हैं।
नित्यानंद राय एक सांसद हैं और उनकी एक सामाजिक जिम्मेवारी भी है। जिस जाति के कोटे का प्रतिनिधित्व पार्टी में करते हैं, उसके प्रति भी उनकी जवाबदेही है। पार्टी में जातीय वोटों की ठेकेदारी उनकी तभी चलेगी, जब सत्ता की मलाई के बंदरबांट में कुछ हिस्सा यादवों के हाथों तक पहुंचे। लेकिन इस मामले में नित्यानंद राय पूरी तरह विफल रहे हैं। यही कारण है कि जातीय वोटों की ठेकेदारी उनके हाथ से फिसल जा रही है और पार्टी भी उनकी इस नाकामी का आकलन कर हाशिये पर धकेलने लगी है। वे समय रहते अपनी सामाजिक जवाबदेही के प्रति सचेत नहीं हुए तो भाजपा भी उन्हें कब तक ढोएगी। यही बड़ा सवाल है।










