वैशाली जिले का राघोपुर विधान क्षेत्र बिहार की सबसे चर्चित सीट है, जहां से तेजस्वी यादव तीसरी बार उम्मीदवार होंगे। 2015 और 2020 में इसी क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। यहां से 2010 में राबड़ी देवी चुनाव हार गयी थीं। उन्हें पराजित किया था जदयू के सतीश कुमार राय ने।

हमारी पुस्तक ‘राजनीति की जाति पार्ट 2’ में संकलित आंकड़ों के अनुसार, राघोपुर में यादव जाति के वोटरों की संख्या 1 लाख 15 हजार है तो दूसरी सबसे बड़ा वोटर समूह राजपूत है। राघोपुर में राजपूत वोटरों की संख्या 78 हजार है, जबकि दुसाध वोटरों की संख्या 52 हजार है। अन्य जातियों की आबादी इनकी तुलना काफी कम है। यहां वर्तमान में वोटरों की संख्या 3 लाख 70 हजार के आसपास है। हमारी पुस्तक ‘राजनीति की जाति -पार्ट 2’ में बिहार के सभी विधान सभा क्षेत्रों की 10 प्रमुख जातियों की वोटर संख्या प्रकाशित की गयी है। इस पुस्तक की कीमत पचपन सौ (5500) रुपये है। किसी के दिमाग में चुनाव लड़ने का भूत सवार हो तो किताब तुरंत बुक कीजिये और पटना में प्राप्त कर लीजिये। पुस्तक की बुकिंग एडवांस पेमेंट पर जारी है। यह पुस्तक पिछले पांच वर्षों के चुनावों का इनसाइक्लोपीडिया है और राजनीतिक घटनाओं का दस्तावेज भी।

हम बात रहे थे राघोपुर की। 2010 में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को जदयू उम्मीदवार के रूप में सतीश राय ने लगभग 13 हजार मतों से पराजित किया था। लेकिन 2015 में जदयू ने उन्हें बेटिकट कर दिया। उस समय जदयू और राजद में गठबंधन था। इसलिए जदयू ने सतीश राय को राजनीतिक बलि चढ़ाकर सीट राजद को सौंप दिया। इसी सीट से तेजस्वी यादव गठबंधन के उम्मीदवार बनाये गये।
भाजपा को भी किसी उम्मीदवार की जरूरत थी। झट से भाजपा ने जदयू से बेटिकट हुए सतीश राय को लपक लिया। उन्हें भी एक बड़ी पार्टी का सपोर्ट मिल गया था। इसीलिए भाजपा के बढ़े हुए झंडे को थाम लिया। लेकिन चुनाव में सतीश राय 2010 वाला करिश्मा नहीं दिखा पाये। 2015 में भाजपा उम्मीदवार के रूप में सतीश लगभग 23 हजार मतों से तेजस्वी यादव से पराजित हो गये। 2020 में भी दोनों उम्मीदवार आमने-सामने थे। हार का मार्जिन बढ़कर 38 हजार से अधिक हो गया।
भाजपा आगामी चुनाव में तेजस्वी के खिलाफ उम्मीदवार को लेकर पशोपेश में है। दो बार पराजित उम्मीदवार को तीसरी बार टिकट देने में भाजपा हिचक रही है। लेकिन फिलहाल कोई ऑप्शन उसके पास नहीं है। इस सीट से भाजपा को कोई यादव उम्मीदवार ही चाहिए। भाजपा एक ऐसा उम्मीदवार चाहती है जो नामदार भी हो और दामदार भी। भाजपा इस सीट को अनसेफ भी मानती है। लेकिन उम्मीदवारी त्याग नहीं सकती है। इसलिए वह नया पहलवान तलाश रही है। जदयू या लोजपा को भी इस सीट में रुचि नहीं है। इस सीट को लेने का मतलब है अपने कोटे की एक सीट खोना। यह सीट भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गयी है। सतीश राय भी इस सीट से लड़ने को इच्छुक हैं या नहीं, यह समय ही बताएगा।










