बिहार में चुनाव की तैयारी जोर-शोर से हो रही है। महागठबंधन की वोट अधिकार यात्रा चल रही है और एनडीए की मलाई यात्रा। मलाई यात्रा के माध्यम से सरकार वोटरों को छूट पर छूट दिये जा रही है और आर्थिक रियायत दे रही है।
दोनों यात्रा के माध्यम से वोटरों को रिझाने का अभियान चल रहा है। इन अभियानों का सबसे बड़ा असर चुनाव के उम्मीदवारों पर पड़ने वाला है। महागठबंधन के विधायकों और टिकट के दावेदारों का कहना है कि वोट बचाएंगे तो टिकट फिसल जाएंगा और टिकट बचाएंगे तो वोट खिसक जाएगा। उधर भाजपा प्रभाव वाली राज्य सरकार ने उम्मीदवारों के गले में वोट की कीमत का रेट लिस्ट टांग दिया है। एक परिवार के वोट की कीमत 10 हजार रुपये तय कर दी गयी है। यह लोकल बॉडी के चुनाव में वोट के रेट से भी ज्यादा महंगा हो गया है।

इस संदर्भ में आगे बढ़ने से पहले हम अपने पाठकों से आग्रह करेंगे कि आप हमारी पुस्तक ‘राजनीति की जाति पार्ट -2’ खरीद कर पढ़ सकते हैं। इसमें बिहार के सभी विधान सभा क्षेत्रों में 10 प्रमुख जातियों के वोटरों की संख्या संकलित की गयी है। चुनाव लड़ने के इच्छुक पाठक इस पुस्तक को 5500 रुपये में खरीद सकते हैं। इसमें बिहार की राजनीति से जुड़ी बहुत सारी सामग्री संग्रहित है। इस पुस्तक की बिक्री एडवांस बुकिंग पर जारी है। अगर चुनाव में टिकट खरीदने की ताकत आपको नहीं है तो किताब खरीद कर साढ़े पांच हजार रुपये नहीं डुबाएं। यही हमारी सलाह है। आपका आर्थिक हित हमारे किताब बेचने से ज्यादा जरूरी है।
हम लौटते हैं विधान सभा चुनाव में वोट के रेट पर। राज्य मंत्रिमंडल की शुक्रवार को हुई महत्वपूर्ण बैठक में एकमात्र एजेंडे पर मुहर लगायी गयी। मंत्रिमंडल के फैसले के अनुसार, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत प्रदेश के सभी परिवारों की एक-एक महिला सदस्य हो मनपसंद रोजगार शुरू करने के लिए 10 हजार रुपये पहली किस्त के रुपये दिये जाएंगे। आचार संहिता लागू होने से पहले सभी इच्छुक महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये भेज दिये जाएंगे। यदि फिर से नीतीश कुमार की सरकार बन गयी तो दो लाख रुपये तक जरूरत के अनुसार आर्थिक सहयोग और दिया जाएगा। संभव है 15 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित बिहार दौरे के दिन महिलाओं के खाते में पैसे का अंतरण खुद प्रधानमंत्री अपने हाथों से करेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भूमिका अब सिर्फ ताली बजाने की रह गयी है। सीतामढ़ी में जानकी मंदिर के उद्घाटन में भी ताली बजा रहे थे और आगे भी इसी भूमिका का निर्वाह करते रहेंगे।
दरअसल मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपये का भुगतान वोट खरीदने के लिए नकदी भुगतान है। इसका भुगतान भी गाजे-बाजे और बैंडबाजे के साथ किया जाएगा। चुनाव में वोटर को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि वोट खरीदने के लिए यह सरकारी निर्णय है। इसकी वैधानिकता पर भी जनता सवाल नहीं उठा सकती है, क्योंकि इसे राज्य मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दी है। सरकार के इस फैसले से सरकार के साथ खड़ी पार्टियां खुश हो सकती हैं। उसके विधायक गदगद हो सकते हैं। लेकिन खतरा सभी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए है।
चुनाव के दौरान वोटर इस बात से गदगद रहेगा कि सरकार एक परिवार के वोट हासिल करने के लिए 10 हजार रुपये का भुगतान पहले कर चुकी है। अब उम्मीदवार प्रति परिवार वोट के लिए कितना पैसा देंगे। जब सरकार ही वोट खरीद रही है तो वोटर अपना वोट क्यों नहीं बेचे। विधान परिषद चुनाव में राज्यपाल और विधान सभा कोटे के चुनाव में पार्टी या सरकार उम्मीदवारों से कीमत वसूलती है। लेकिन लोकल बॉडी, स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में सीधे वोटर उम्मीदवार से पैसा वसूलता है। सौ फीसदी वोटों की खरीद-बिक्री हो, ऐसा नहीं है। लेकिन इतना वोट जरूर खरीदा जाता है, जिससे जीत सुनिश्चित हो सके।
वोट बेचने-खरीदने का धंधा विधान सभा चुनाव में इतना बेशर्म नहीं था, जितना विधान परिषद चुनाव में था। लेकिन सरकार इस धंधे में अब खुद उतर आयी है। इसलिए बेशर्मी निर्लज्जता तक पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
चुनाव के ठीक पहले हर परिवार के खाते में वैधानिक रूप से दस-दस हजार रुपये का भुगतान करना कोई गुनाह नहीं है। लेकिन जिस मकसद से यह भुगतान किया जा रहा है, यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। इसकी कीमत भी सरकार बनाने के लिए चुनाव मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों को ही भुगतना पड़ेगा।











