पिछले दो-तीन दिनों से हम बांकीपुर के एक संभावित उम्मीदवार के रूप में पोस्ट लिख रहे थे। आज का हमारा पोस्ट एक पत्रकार के रूप में है। जब उम्मीदवार होते हैं तो खबरों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं, जबकि जब पत्रकार होते हैं तो खुद को फैक्ट के साथ खड़ा करना पड़ता है। आज हम फैक्ट के साथ हैं। जो फैक्ट है, वही आपको बताएंगे।
पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान बांकीपुर में बूथों की संख्या 422 थी। कुल नौ उम्मीदवार थे। भाजपा के नितिन नवीन और राजद की रेखा कुमारी गुप्ता थीं। इस चुनाव में विभिन्न उम्मीदवारों के पक्ष में डाले गये वोटों की संख्या 155421 थे, जबकि बांझ वोटों की संख्या 1464 थी। बांझ वोट मतलब नोटा। इस चुनाव में भाजपा को 98299 यानी 63 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि राजद को 46363 यानी 30 फीसदी वोट मिले थे। यहां कुल वोटरों की संख्या 379402 थी। इसमें से मात्र 41 फीसदी वोटरों ने मतदान किया था।
2025 का विधान सभा चुनाव पूरी तरह एकतरफा था। भाजपा के बूथ मैनेजमेंट के आगे राजद हवा हो गया था। हम बांकीपुर विधान सभा क्षेत्र में बूथवार मिले वोट का विश्लेषण कर रहे थे तो डाटा आश्चर्यजनक था। पूरा बांकीपुर विधान सभा क्षेत्र यादव और मुसलमान वोटों से भरा पड़ा है। दर्जनों बूथ सिर्फ मुसलमान प्रभाव वाले हैं। लेकिन 422 बूथों में से मात्र 37 बूथों पर राजद की उम्मीदवार भाजपा उम्मीदवार से आगे थीं, जबकि शेष सीटों पर भाजपा ही आगे थी। बूथ संख्या 58 पर भाजपा और राजद दोनों को बराबर वोट मिले थे 208-208।
राजद के चुनाव प्रबंधन से जुड़े एक साथी का कहना था कि बांकीपुर में बनियों के वोटों की संख्या निर्णायक स्थिति में है, लेकिन राजद उम्मीदवार बनिया वोटों को तोड़ने में विफल रहीं, जबकि टिकट की दावेदारी के समय उनका दावा था कि बनिया वोट को तोड़ लेंगे।
हालांकि राजधानी की चारों सीटों पर राजद या कांग्रेस के उम्मीदवार यह मानकर चलते हैं कि भाजपा की जीत सुनिश्चित है। मार्जिन के अंतर पर बहस हो सकती है। उम्मीदवार के साथ पार्टी का नाम जुड़ते ही वोटों का जातीय ध्रुवीकरण हो जाता है। इस खेल में राजद का आधार कमजोर पड़ जाता है।
बांकीपुर उपचुनाव में फिर लालटने का शीशा चनकने ( टूटना ) का खतरा बरकरार है। इसकी वजह है कि राजद या कांग्रेस का कोई मजबूत संगठन नहीं है। माले का आधार भी कमजोर है। इसके बावजूद 30 फीसदी वोट लाना राजद के कार्यकर्ताओं से ज्यादा आधार वोट की जातीय गोलबंदी का असर है। जातीय गोलबंदी बढ़ाने के लिए किसी भी विरोधी गठबंधन को नये सिरे से मंथन करना चाहिए।










