5 जुलाई को राजद का स्थापना दिवस था। भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। वर्चुअल माध्यम से लालूजी ने इसका दिल्ली से उद्घाटन किया। उन्होंने करीब 11 बजे उद्घाटन किया। हम भी उस मजमे में शामिल थे। इसके बाद हमारी बेचैनी बढ़ने लगी। हमारी चिंता थी अपनी टप्पर बिछाने की।
राजद का बड़ा आयोजन था। हमारे पास राजद प्रमुख लालू यादव के संसद और विधानमंडल में दिये गये भाषणों का संकलन वाली पुस्तक है। नाम है – सदन में लालू प्रसाद: प्रतिनिधि भाषण। हमारा मकसद था कि इस मौके पर बड़ी संख्या में पुस्तक के ग्राहक मिल जायेंगे। प्रदेश भर से राजद के नेता आये थे। सब बड़े-बड़े नेता थे।
हम लालूजी के उद्घाटन संबोधन के बाद गेट पर आ गये और गेट के बाहर फूटपाथ पर अपना बैनर बिछा का भाषणों वाली पुस्तक पसार दिया। इसके साथ अपनी पत्रिका वीरेंद्र यादव न्यूज की कॉपी भी रख दी। 11 बजे से 3 बजे तक हम अपनी ‘दुकान’ पर डटे रहे ग्राहक के इंतजार में। करीब 4 घंटे तक हम दुकान पर जमे रहे। इस दौरान दो साथी रणविजय और रमेश आये। इन दोनों ने थोड़ा-बहुत सहयोग पत्रिका बांटने में किया, लेकिन जब से आये, तब से ये दोनों मजमा उठने तक साथ में खड़े रहे।

चार घंटे में पुस्तक देखने वाले भिन्न–भिन्न प्रकार के लोग आये, लेकिन उनमें से कोई ग्राहक नहीं बन सका। हम कभी छाया तो कभी धूप में दुकान के पास जमे रहे। लगभग मजमा उठने को था कि एक लड़का आया। उसने बताया कि मेरा नाम मयंक है और मधेपुरा से आये हैं। आप से कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन नहीं हो सकी। फिर उसने सवाल पूछा कि पत्रिका का पूरा काम आप ही करते हैं। हमने कहा कि हां। इसके बाद उसने कहा कि आपके साथ सेल्फी लेना चाहते हैं। हमने कहा कि ले लो। लेकिन हमारी नजर और दिमाग दोनों ग्राहक पर अटका था। थोड़ी देर बाद वह फिर लौट कर आया। लालू यादव वाली किताब हमें पढ़ना है। वह आगे कुछ कहना चाहता था कि चुप हो गया। हमने कहा कि किताब पढ़ना है तो ले जाओ। हमने किताब उठाकर उसे दी तो वह कहने लगा कि पैसा हम यूपीआई (ऐसा ही कोई शब्द था) से भेज देंगे। हमने कहा कि जाओ तुम पढ़ो। पैसा भेजने की जरूरत नहीं है। वह चला गया।
उस मयंक की पढ़ने की ललक और पुस्तक मांगने के हौसले ने मेरा मनोबल बढ़ाया। हमें लगा कि पिछले चार घंटों से निरर्थक बैठने का सार्थक परिणाम यही है। आमतौर पर हम आदमी के नाम पूछने के बाद जाति पूछ लेते हैं, लेकिन उसने न नाम पूछने का मौका दिया और न जाति।
दरअसल लालू यादव का राजद दो हिस्सों में बंट गया है। एक है सत्ता का राजद और दूसरा है संवेदना का राजद। 15 से 25 लाख की गाडि़यों पर चढ़ने वाले लोग सत्ता वाले राजद के नेता और कार्यकर्ता हैं। वह राजद के साथ सत्ता की अपेक्षा में जुटे हुए हैं। जबकि मयंक जैसे लाखों कार्यकर्ता संवेदना के स्तर पर राजद से जुड़े हुए हैं। जो अभाव के बीच लालू यादव के साथ जीना चाहता है। मयंक मधेपुरा से पटना तक आया तो राजद का कार्यकर्ता ही होगा। वह लालू यादव के भाषणों के साथ खुद को जोड़ना चाहता है तो वह राजद के साथ संवेदना के स्तर पर जुड़ा हुआ होगा। वह लालू यादव को देखने या सुनने के लिए पटना आया होगा।
मयंक कुछ देर के लिए हमारे पास आया और एक स्टोरी की जमीन छोड़ गया। उसने खाना भी खाया था या नहीं, वापस जाने का किराया था या नहीं। कई सवाल उसके जाने के बाद मेरे मन में उठता रहा। दरअसल मयंक जैसे कार्यकर्ता ही संवेदना के साथ राजद से जुड़े हैं और वही पार्टी की रीढ़ हैं। उसी रीढ़ के भरोसे सत्ता वाला राजद अपनी गाडि़यों का काफिला दौड़ा रहा है। संवेदना और सत्ता के बीच संतुलन बनाकर ही एक मजबूत राजद की यात्रा को सुरक्षित और दीर्घावधिक बनाया जा सकता है।








