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Family Power Plan के लाभार्थी हैं 66 विधायक

विधान सभा चुनाव में पारिवारिक कंडिडेट की होड़

Birendra Yadav by Birendra Yadav
August 23, 2025
in जाति, बिहार, राजनीति
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Family Power Plan के लाभार्थी हैं 66 विधायक
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विधान सभा चुनाव की जमीन कोड़ने और आरी-कियारी की साफ-सफाई का काम शुरू हो गया है। हर पार्टी और नेता चुनाव में उम्‍मीदवार के लिए दावेदारों की रेस लगा रहे हैं। पार्टी कार्यालयों में टिक‍टार्थियों की भीड़ जुट रही है। इन दावेदारों में सबसे अधिक पारिवारिक विरासत वाले नजर आ रहे हैं। कोई अपने दादा की विरासत का दावा कर रहा है तो कोई अपने बाप की पार्टी के प्रति सेवा की दुहाई दे रहा है। अपनी वफादारी के भी कसीदे गढ़ रहे हैं। यह स्‍वाभाविक भी है और पारिवारिक दावेदारों को पार्टियां ज्‍यादा संभावनाशील मानती हैं। कई विधायक भी अपनी जगह अपने बेटे को एडजस्‍ट करना चाहते हैं।
विदाई के मुहाने पर खड़ी सत्रहवीं विधान सभा में कम से कम 66 विधायक ऐसे हैं, जिनके मां, पिता, दादा, ससुर, पति या कोई अन्‍य करीबी परिजन विधायक या सांसद रह चुके हैं। इसमें हर जिले से, हर पार्टी से और हर जाति के लोग शामिल हैं। राज्‍य सरकार में कई मंत्री के माता, पिता या दादा विधायक या मंत्री रह चुके हैं। इस विधायकों की सूची के लिए आप संपादक से संपर्क कर सकते हैं।
राजनीतिक शब्‍दावली में एक शब्‍द है सत्‍ता का स्‍थानांतरण। एक पार्टी से दूसरी पार्टी को सत्‍ता स्‍थानांतरित होती है। एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति को सत्‍ता हस्‍तांतरित होती है। लेकिन जब सत्‍ता स्‍थानांतरण की प्रक्रिया परिवार के हाथों में सिमट जाती है तो इसे कहते हैं राजनीतिक सत्‍ता का केंद्रीकरण। इसे आप ‘फैमिली पावर प्‍लान’ भी कह सकते हैं। इस प्‍लान के तहत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सत्‍ता केंद्रीकृत हो जाती है। फैमिली पावर प्‍लान के लाभार्थी कहते हैं कि उन्‍हें जनता चुनती है। बिल्‍कुल सही बात है। कोई भी विधायक जनता के वोटों से निर्वाचित होता है। लेकिन जनता उन्‍हें ही क्‍यों चुनती है।
इसको दूसरे संदर्भ से समझने का प्रयास करते हैं। विधायक का चुनाव जनता बाद में करती है। उम्‍मीदवार के रूप में पार्टियां उनका चयन पहले करती हैं। हर पार्टी को चुनाव जीतने लायक उम्‍मीदवार चाहिए। राजनीतिक की व्‍यावहारिक जमीन पर पूर्व विधायकों के परिजनों के लिए जीत की संभावना नये उम्‍मीदवारों की तुलना में ज्‍यादा होती है। वजह यह है कि उस परिवार को क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक बनावट और जातियों की बसावट की समझ होती है। वोटर के एक बड़े वर्ग के साथ पूर्व से संबंध होता है। इस कारण उम्‍मीदवार और वोटर के बीच इंटरएक्‍शन ज्‍यादा आसान हो जाता है। ऐसे उम्‍मीदवारों की स्‍वीकार्यता भी बढ़ जाती है।
जब हमने विधायकों की पारिवारिक बनावट और राजनीतिक प्रतिबद्धता का विश्‍लेषण किया तो यह बात साफ-साफ दिखी कि किसी भी विधायक के लिए कोई राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं रही है। राजनीतिक प्रतिबद्धता से पार्टियों को भी कोई वास्‍ता नहीं है। सबसे बड़ी चीज है कि किस पार्टी के साथ जाने से जीत की संभावना बढ़ जाती है। इसमें वैचारिक प्रतिबद्धता के बजाये जातीय जड़ता की भूमिका ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हो जाती है। ऐसे कई विधायक हैं, जिनके दादा कांग्रेस में, पिता राजद में और वे भाजपा के साथ हैं। इसमें हमने पाया कि राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण विधायक भाजपा के साथ जाने में सहज महसूस करते हैं, जब‍कि यादव का झुकाव राजद की ओर रहा है। हालांकि यह धारणा को सौ फीसदी परफेक्‍ट नहीं माना जा सकता है।
महिलाओं के संदर्भ में बात करें तो एकाध महिला को छोड़कर लगभग सभी महिला विधायक अपने पति, पिता या ससुर की राजनीतिक पहचान के कारण राजनीतिक में आयी हैं और पार्टियों ने उनकी दावेदारी स्‍वीकार की। यही स्थिति हर पार्टियों में है।
‘फैमिली पावर प्‍लान’ के लाभार्थी विधायकों में से अधिकतर स्‍वतंत्र राजनीतिक पहचान, कद और व्‍यक्तित्‍व गढ़ने में विफल रहे हैं। पारिवारिक विरासत और अनुकंपा के सहारे राजनीति में प्रवेश पाने कुछ अपनी पहचाने बनाने में जरूर सफल हुए हैं, लेकिन वे अपने दादा, पिता या परिजन की छाया से मुक्‍त नहीं हो पाये हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि पार्टियां उम्‍मीदवार चुनने में ज्‍यादा लोकतांत्रिक और परिवार के आवरण से मुक्‍त होने का प्रयास करेंगी। तब शायद चुनाव ज्‍यादा लोकतांत्रिक और बहुआयामी हो सकेगा।
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https://www.facebook.com/kumarbypatna
Tags: family-power-plan
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