बिहार में एक नेता हैं तेजस्वी प्रसाद यादव। विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष होने के साथ ही, राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। परिवार की पार्टी है तो पद भी पारिवारिक। यह सभी पार्टियों में होता है। क्षेत्रीय और व्यक्ति आधारित पार्टियों में यह प्रवृत्ति ज्यादा पायी जाती है। कांग्रेस इसकी प्रणेता रही है और अब भाजपा भी उसी राह पर है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी वंश परंपरा के विस्तार हैं।
हम विपक्ष की बात कर रहे थे। पिछले 20 वर्षों से राजद विपक्ष में है। कभी-कभी सत्ता का जूठन हिस्से में आया तो जल्दी ही छीन भी गया। इन 20 वर्षों में राजद 3 साल सत्ता में रहा और बाकी समय सत्ता की प्रतीक्षा में। शुरू के दस साल राजद भाईगिरी निभाता रहा और बाद के 10 साल से चाचागिरी निभा रहा था। अब चच्चा ही सीन से गायब हो गये तो भतीजा निराशा हो गया है।
हमें लग रहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद तेजस्वी यादव ज्यादा आक्रामक और सक्रिय होंगे। चूंकि अब उपमुख्यमंत्री बनने की संभावना भी समाप्त हो गयी है। लड़ना ही विकल्प बच गया है। लेकिन हुआ ठीक इसके विपरीत। भाजपा के सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद तेजस्वी यादव कंप्यूटर की भाषा में स्लीप मोड में चले गये हैं। संगठन से लेकर सत्ता की संभावना तक पस्त और सुस्त पड़ गयी है। अब तो खुद उनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी डेंजर जोन में चली गयी है। कुर्सी बचाये रखने के लिए उन्होंने मौन साध लिया है। सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने का साहस खो बैठे हैं। कभी-कभी उन्हें अहसास होता है कि नेता प्रतिपक्ष भी हैं तो पीसी कर लेते हैं।
तेजस्वी यादव जी, सत्ता में पगा हुआ विपक्ष मुर्दा हो जाता है। आप पगा हुआ का अर्थ नहीं समझ रहे होंगे। जब जलेबी को छानकर चीनी की चासनी में डालकर निकालते हैं तो इस स्थिति को पगा हुआ कहते हैं। आप तीन साल तक सत्ता की मलाई चाभने के बाद अब लड़ने का हिम्मत खो चुके हैं। 18 महीने बाद जब आप 2017 में सत्ता में बाहर आये थे तो आपमें लड़ने की इच्छा शक्ति बची हुई थी, लेकिन जब दुबारा सत्ता में लौटे तो उसके बाद आपकी लड़ने की इच्छा शक्ति ही मर गयी। इसलिए अब आप लड़ नहीं सकते हैं।
भारत का संसदीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि सत्ता से दूर विपक्ष की भूमिका निभाने वाला दल लंबे समय तक लड़ सकता है, लेकिन सत्ता की मलाई चाभ चुकी पार्टी न लंबे समय तक जीवित रहती है और न लंबी लड़ाई लड़ सकती है। केंद्रीय सत्ता में पहुंची जनता पार्टी तीन सालों में बिखर गयी थी और 1989 में सत्ता में पहुंचा जनता दल 4-5 सालों में बिखर गया था। जनता दल के नेताओं ने क्षेत्रीय दल के रूप में अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाये रखा था और बाद में यही पार्टियां क्षेत्रीय दल के रूप अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं।
तेजस्वी जी, आपका अपना दल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। आपकी पार्टी और आपका नेता प्रतिपक्ष का पद भाजपा की अनुकंपा पर बचा हुआ है। आप एक मजबूत जनाधार के नेता हैं। इसलिए वोट नहीं बिखर रहा है। अनुकंपा की राजनीति की उम्र लंबी नहीं होती है। अनुकंपा की राजनीति बिहार में नीतीश को निगल गयी। आप भी भाजपा की अनुकंपा पर आश्रित रहे तो आपका जनाधार बिखरते देर नहीं लगेगी।
हम भी इसी बिहार के वोटर हैं और राजनीति में रुचि रखते हैं। आपके शुभचिंतक भी अब बागी होने लगे हैं। उन्हें लगता है कि तेजस्वी अब उम्मीदों के सारथि नहीं बन सकते हैं। लेकिन आपका कोई विकल्प नहीं है। इसलिए उम्मीदों का केंद्र आप बने हुए हैं। आपके आसपास भटकने वाले मधुमक्खी आपसे मिलने वालों को डंक मारते रहते हैं। आपसे संवाद के सभी रास्तों को बंद कर दिया है। आम लोगों को यही लगता है, लेकिन संभव है कि आपने ही संवाद के सभी रास्ते बंद करने के निर्देश दिये हों। वस्तुस्थिति जैसी भी हो, बिहार की उम्मीदों के साथ अब आप फीट नहीं बैठ रहे हैं। यह आपके आधार वोट के लिए खतरनाक है, लेकिन यह स्थिति आपके लिए भी लाभदायक साबित नहीं होगी।










