रविवार यानी 3 मार्च की दोपहर हम माड़, भात और साग खाकर सो रहे थे। पटना के गांधी मैदान में महागठबंधन की महारैली थी। नाम था जनविश्वास महारैली। रैली में जाने का मन नहीं था। मन में यही सोच रहे थे कि तेजस्वी यादव हमें न एमएलसी बनाएंगे, न लोकसभा का टिकट देने वाले हैं। फिर बेमतलब का भीड़ का हिस्सा क्यों बने। लेकिन मन नहीं माना। हमें लगा कि यह महारैली हमारे लिए भले बेमतलब की हो, लेकिन हमारे पाठकों की रुचि इस रैली की भीड़, भाषण और नेताओं की उपस्थिति में जरूर होगी। वे हमारे नजरों से रैली देखना चाहेंगे। यदि हम गांधी मैदान नहीं गये तो पाठकों के साथ नाइंसाफी होगी।
हम अपना झोला घर में ही छोड़कर गांधी मैदान के लिए प्रस्थान कर गये। फटफटिया अपने एक दोस्त के दरवाजे पर खड़ी कर एसपी वर्मा रोड से गांधी मैदान की ओर बढ़े जा रहे थे। करीब सवा दो बज रहा था। तेजस्वी यादव का भाषण माईक पर सुनाई पड़ रहा था। भाषण के साथ हम भी आगे बढ़ते जा रहे थे। हम जेपी गोलबंर वाले गेट से गांधी मैदान में प्रवेश किये। हमारी रुचि भाषण से ज्यादा भीड़ में थे। हम गांधी मैदान में मंच की ओर बढ़ने के बजाये गांधी मैदान का चक्कर लगाने में जुट गये। गांधी मैदान में बने फूटपाथ से झंडोत्तोलन वाले स्थान की ओर बढ़ने लगे। मुख्य मंच से आधे मैदान तक भीड़ भरी हुई थी। एक्जिविशन रोड से एसएसपी कार्यालय के बीच गांधी मैदान में बनी सड़क तक सघन भीड़ थी। उसके बाद उपस्थिति कम थी।
हम भीड़ के बीच लोगों की उपस्थिति का आकलन कर रहे थे। इस बीच भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का फोन आया। उन्होंने पूछा कि आप कहां हैं। हमने कहा कि गांधी मैदान में हैं। फिर उन्होंने पूछा कि कौन-कौन प्रमुख नेता आये हुए हैं। हमने कहा कि अभी आ रहे हैं और मंच से काफी दूर हैं। इसलिए मंच के पास जाकर ही बता पाएंगे। उन्होंने भीड़ को लेकर पूछा कि आज की रैली में भीड़ 2013 में नरेंद्र मोदी की भीड़ से ज्यादा है या कम है। तत्काल हमारे पास ऐसा कोई आकलन नहीं था। 2013 में हम पत्रकार दीर्घा में थे, इसलिए पीछे की भीड़ का हमारा कोई अनुमान नहीं था। आज भीड़ में थे इसलिए मंच की उपस्थिति का आइडिया नहीं था। लेकिन हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि भीड़ 2013 से कम है। खैर।
हमारी रुचि मंच से ज्यादा भीड़ और भाव पर केंद्रित थी। जब हम गांधी मैदान में चक्क्र मारने के बाद मंच की ओर बढ़ रहे थे तो तेजस्वी यादव का भाषण समाप्त हो गया था। हम मंच की ओर बढ़ने की कोशिश करते रहे, लेकिन भीड़ के मजबूत घेरे को लांघ कर मंच के पास बने डी ब्लॉक तक नहीं पहुंच पाये। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, दीपांकर भट्टाचार्य, डी. राजा आदि का भाषण का चलता रहा। हम लोगों के बीच ही घुमते रहे। कहीं टाट पर बैठकर रोटी-भुजिया खाता समूह मिल रहा था तो कहीं चिनिया बादाम तोड़ते लोग भी दिख रहे थे। बैनर, पोस्टर और गमछी बिछाकर बैठने वालों की संख्या भी कम नहीं थी। गांधी मैदान में हाजिरी लगाने के सबूत के रूप में फोटोग्राफी और सेल्फी लेने वाले भी दिख रहे थे।
लेकिन भीड़ की खासियत थी कि झकास कुरता-पैजामा और स्टाइलिश जूता वाले लोग कम ही नजर आ रहे थे। हवाई चप्पल वालों की संख्या भी काफी थी। एक और बात थी कि कंधे पर झंडा उठाने और लहराने वालों में उत्साह दिख रहा था। झंडों के मामले में राजद पर वामपंथी ज्यादा भारी पड़ रहे थे, जबकि नारों में तेजस्वी यादव का बोलबाला था। कांग्रेसियों की भीड़ कोई उल्लेखनीय नहीं थी। वे गेस्ट खिलाड़ी की भूमिका में थे। डी ब्लॉक वाले घेरे को छोड़ दें तो बाकी की घेरेबंदी ध्वस्त हो चुकी थी। कुर्सियों की हालात भी बदहाल थी। लोग घेरे के बांस और कुर्सियों के सहारे मंच पर नेताओं की झलक देख लेना चाहते थे।
गांधी मैदान में लोगों के आने-जाने का सिलसिला थम नहीं रहा था। ठहराव तब आया, जब लालू यादव भाषण देने मंच पर पहुंचे। हर आदमी अपनी-अपनी जगह पर खड़ा हो गया था। जाने का सिलसिला थम गया था। लोग मंच के पास पहुंच जाना चाहते थे। लालू यादव 3.35 बजे माईक पर आये थे और लगभग 20 मिनट के अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार पर हमलावर रहे। उनके भाषण में सम्मोहन बरकरार था, लेकिन भाषण में ऊर्जा और ओज नहीं था। इस मामले में तेजस्वी यादव अपने पिता पर भारी पड़ रहे थे।
लालू यादव का भाषण शुरू हुआ तो हल्की बारिश भी शुरू हो गयी थी और भाषण समाप्त होते-होते बारिश तेज हो गयी थी। हम भी अपने कपार पर रुमाल रखकर कर स्क्रीन पर लालू यादव का भाषण देख और सुन रहे थे। भाषण समाप्त होने के बाद भीड़ टूट पड़ी। हम भी गांधी मैदान से बाहर निकलने के लिए होटल मौर्या की ओर बढ़ रहे थे। किनारे पहुंचने पर एक पेड़ का ढाल मिला। हम धोकरी में हाथ डालकर रुमाल खोज रहे थे। रुमाल हाथ में नहीं आया तो लगा कि घर में छूट गया होगा। हाथ से माथे का पानी पोंछने की कोशिश की तो समझ में आया कि रुमाल माथे पर पड़ा है और पानी से लथपथ है। थोड़ी देर और बारिश हुई, फिर आसमान साफ हो गया। इसी बीच दिल्ली और भोपाल से दो और लोगों का फोन आया। वे भी रैली के संबंध में जानकारी चाहते थे। तब समझ में आया कि पाठकों का भरोसा अपनी किसी भी इच्छा या आकांक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है।










